स्त्री मन

गुंजाइशें तो थीं मगर


उषा राय

सौंदर्य स्थायी तो होता नहीं। सुबह का सौंदर्य, बारिश का सौंदर्य, ओस का सौंदर्य दिखा नहीं कि ढल गया। इसलिए मुझे इस सौंदर्य के पुजारी के समर्पण पर तनिक शक था। पता नहीं क्यों, ऐसा लगता रहा कि यह सब तब तक है, जब तक कि तुम अप्राप्त हो।  

आज तुम कितनी उदास होगी इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता सिवाय तुम्हारे और मेरे। आज हमारे बीच की सारी ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई है। पर तुम क्या जानो कि हुआ क्या। मैं बताती हूं.. मेरे हाथ में मनु की चिट्ठी है। हैरानी की बात तो ये है कि यह चिट्ठी नहीं एक तरह का प्रपोजल है।

सब तुम्हारे आसपास मंडराते रहते थे। इसलिए मैं तुम्हें झील कहती थी। पर झील के इर्द-गिर्द कुछ ज्यादा ही पक्षी बसेरा बनाने लगे थे। चलो पहले नीली आंखों वाले की बात करते हैं। कितनी अमीरी टपकती थी उसकी बातों से, चेहरे से। पैसों से हमेशा तैयार रहता था। हम लोग कैंपस के लॉन में बैठकर आपस में कितना मजाक करते थे। मैंने तुमसे कहा- तुम भारतीय सौंदर्य का प्रतिमान हो। उस दिन तुम रेड सूट पहनकर आई थी। याद है, वाकई बहुत सुंदर लग रही थी। आंखें आम की फांक, होंठ संतरे की फांक, दांत अनार। हंसकर बोली थी तुम- ये प्रतिमान गिना रही हो या फलों के नाम। सुनीता बड़ी देर से चुप थी। तुरंत बोली- ये सारे उपमान पुरुषों के दिए हुए हैं। यह अलग बात है कि देखना भी उन्हीं को होता है। हमारे समाज में स्त्री के रूप पर स्त्री मुग्ध नहीं होती है।

पर हां, एक तो था, जिसके व्यक्तित्व पर हम सभी फिदा थे। वह तुम्हारे प्रति अपने प्यार का दावा करता। वह मनु था। प्रेम का सीधा संबंध सौंदर्य से होता है। और यहां वही था। सौंदर्य स्थायी तो होता नहीं। सुबह का सौंदर्य, बारिश का सौंदर्य, ओस का सौंदर्य दिखा नहीं कि ढल गया। इसलिए मुझे इस सौंदर्य के पुजारी के समर्पण पर तनिक शक था। तुम उसके बारे में अक्सर नई-नई बातें करती और मैं उस पर अपनी बुद्घि और कल्पना से उसे दिलचस्प कर देती। पता नहीं क्यों, ऐसा लगता रहा कि यह सब तब तक है, जब तक कि तुम अप्राप्त हो।     

मनु तुम्हारा स्कूल टाइम का क्लासमेट था। मुझसे तुम्हारी मुलाकात कॉलेज के पहले दिन से थी। कुछ ही दिनों में वह तुम्हें ढूंढ़ता हुआ आया। मेरे ठीक सामने आकर उसने तुम्हारे बारे में पूछा। मैंने सिर्फ और सिर्फ उसकी आंखें देखीं और उंगलियों से तुम्हारी ओर इशारा कर दिया। वह तुमसे मिला भी और चला भी गया। कई साल आए और कई साल गए, पर मेरी आंखें आज भी वहीं टंगी हैं। उन आंखों का आकर्षण कितना अद्भुत था कितना गोपनीय। मुझे ढंग से तुम्हें बताना नहीं आया। मैंने टुकड़े-टुकड़े जोड़कर बताया भी, पर तुम समझ नहीं पाई। कुछ पंक्तियां जरूर लिखा गई थीं डायरी में अनायास ही।

अच्छा सुनो! तुम्हें याद है न। एक दिन हम तुम एक साड़ी की दुकान पर गए थे। हमने कुछ साडियां देखीं। एक गुलाबी साड़ी पर हम दोनों ने एक साथ उंगली रख दी। एक-दूसरे की ओर देखा और हंस दिए। चलो..बांट लेते हैं। साल-साल भर पहनेंगे। हम फिर हंसे थे। इसी दौरान हमने हिंदी के मुख्य उपन्यासों और उपन्यासकारों जैसे अज्ञेय, निर्मल वर्मा, यशपाल, अमृत लाल नागर, रविन्द्रनाथ टैगोर आदि को पढ़ा। एक बार यूं ही मैंने और तुमने मिलकर लिखी कुछ पंक्तियां-

लंबे रेगिस्तान के हम दो साथी वृक्ष, हम दो यार, हम दो अफीमची, हम दो तैराक आदि। पर कविता नहीं बन पाई। उन्हीं दिनों हमने पिकनिक का प्रोग्राम बनाया था। शहर की शान समझी जाने वाली इमारतों को तो हमने बड़े अनुशासन से देखा पर बाद के पार्कों को हम नीलगायों की तरह धांग रहे थे। मेरा प्यास के मारे बुरा हाल था। मैं नल चलाकर पानी पीने की कोशिश कर रही थी। तभी मनु आया और नल चलाने लगा, मैंने जी भर पानी पिया। उसने कहा था- तुम इतनी प्यासी थीं। बताया क्यों नहीं।
इम्तिहान का आखिरी दिन था और उसका पत्र छोटा तथा तिरछे में हस्ताक्षर मात्र था। तुमने इसे हल्के में लिया। तुम्हें यह संतोष था कि वह तुम्हारा ही है। धीरे-धीरे मिलना भी कम हो गया था। एक दिन पता चला कि उसका सलेक्शन हो गया है। तुम्हें मनु के बारे में कुछ न कुछ आभास तो हुआ ही होगा और उदासी छा गई होगी। मेरे पास मनु की प्रपोजलनुमा चिट्ठी है। मैं नहीं जानती कि इसके पीछे क्या राज है। मैं कहीं गहरे में उससे प्रभावित थी। लेकिन उसका झुकाव तुम्हारी ओर देखकर अपने को निर्ममता पूर्वक बटोर लिया था। मैं अच्छी तरह जानती हूं कि मनु अपनी परिधि में आई हर चीज को जीतना चाहता है और इसी क्रम में शायद मैं भी हूं। उसने पत्र हिंदी में लिखा है और यह भी लिखा है कि मुझे हिंदी ठीक से नहीं आती। अर्थ का अनर्थ लिख बैठता हूं। सो प्लीज! डोंट माइंड। अब तुम बताओ इस बेर-केर के संबंध का मैं क्या करूं।

तुम्हें इतना वक्त क्यों लग गया मनु। यकीनन तुम बहुत-बहुत अच्छे हो। लेकिन तुम मेरी निसंगता और मेरी दोस्त की संगत के अच्छे दिनों को पंखुडियों की तरह गिराते रहे जबकि वह एक मुकम्मल फूल बन सकता है। अब इस स्तर पर आ गए। नहीं मनु नहीं। और तुम यह भी जान लो कि मौन सदा ही स्वीकृति का लक्षण नहीं होता। मैंने यह पत्र उसे पोस्ट कर दिया है और अब तुम्हें भेज रही हूं।

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