पुरुष मन

हम आह भी भरते हैं


डॉ. के.डी. मिश्र

पुरुषों के बारे में चटखारे ले लेकर चर्चा करना महिलाओं का आम शगल है, फिर चाहे वे कामकाजी हों या सामान्य गृहिणी। मेरा मन करता है कि इनसे पूछूं- क्या महिलाएं ऐसा कुछ नहीं करतीं?  

अरे यार, सक्सेना जी तो बॉस की चमचागिरी कर-कर के प्रमोशन पा ही गए।  मेरे इनके ऑफिस के शर्मा जी तो बॉस की पत्नी के पैर छू-छू कर और सब्जी और सामान लाकर कहां से कहां पहुंच गए। मेरे ऑफिस का बड़ा बाबू जब देखो तब तारीफ करने के बहाने ही ढूंढ़ता रहता है। कभी साड़ी, कभी सूट की। मुझे तो उसकी नजर ही कुछ अच्छी नहीं लगती।

ऑफिस का लंच ब्रेक हो या किटी पार्टी या किसी कुलीग के यहां कोई कार्यक्रम। जहां चार छह महिलाएं जुड़ीं नहीं कि कुछ इसी तरह की बातें होती हैं। ऐसे विषयों पर चटखारे ले लेकर चर्चा करना महिलाओं का आम शगल है, फिर चाहे वे कामकाजी महिला हों या सामान्य गृहिणी। मेरा मन करता है कि इनसे पूछूं- क्या महिलाएं ऐसा कुछ नहीं करतीं? रजनी का भड़कीले परिधान पहनकर ऑफिस आना, बार-बार किसी बहाने से साहब के केबिन में जाना, उनके कपड़ों की, स्वभाव की, पहुंच व रुतबे की तारीफ करके मात्र तीन साल में प्रमोशन पा जाना और दूसरी तरफ शर्मा जी की जी तोड़ मेहनत व भरपूर चमचागिरी के बावजूद पांच साल में प्रमोशन न हो पाना। यह सब क्या है। लेकिन इसके बावजूद पुरुषों के बीच ऐसी बातें विशेष चर्चा का विषय नहीं बनतीं। हां, कभी-कभी दोनों महिला व पुरुष सहकर्मी टिप्पणी कर देते हैं- बेचारा शर्मा।  उधर ऋतु मैडम, किसी बहाने से बॉस के घर क्या गई, उनके घर की ही हो गई। मम्मी-पापा जी के पैर छूना, दीदी (बॉस की पत्नी) से खास आत्मीयता। कभी नई-नई रेसिपी बनाकर ले जाना। केतकी तो और ऊंची चीज निकली। कश्मीर गई थी तो वहां से बॉस की पत्नी के लिए पश्मीना शॉल लाई।

ऐसी घटनाएं-दुर्घटनाएं आम भी हैं और सामान्य भी, पर मन तो मन है। विचार तो उमड़ते-घुमड़ते ही हैं और मंथन में प्रश्न उठ खड़े होते हैं। दोनों ही परिस्थितियों में लाभ तो उन्हें ही मिलता है और चर्चाओं का लुत्फ भी वही उठाती हैं। हम पुरुष तो कभी कभार ही किसी महिला सहकर्मी पर सवाल उठा पाते हैं, हंसी-ठिठोली या व्यंग्य करने पर तो हममें से ही कोई बागी खड़ा होकर नैतिकता का पाठ पढ़ाने लगता है। मैं इसे निर्मल मन मानूं, विशाल हृदय, संस्कार या सामाजिक सरोकार, क्या कहूं? किसी मशहूर शायर का ये शेर याद आता है-

हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,

वो कत्ल भी कर देते हैं तो चर्चा नहीं होती।

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