पैगाम-ए-दिल

एकांत में बैठते ही विचारों का अंतर्द्वंद्व चलने लगता है। मन कभी अतीत के सागर में गोते लगाता है, तो कभी भविष्य की परिकल्पनाओं में मगन हो जाता है। ऐसे ही भावों से ओतप्रोत हैं  नीरज की कविताएं।

शब्द ही नहीं निकलते

शब्द ही नहीं निकलते
मुख से
विचारों के अंतर्द्वंद्व में
गूंजों का अंतर्नाद
समाए दिल में
कुछ भावों, अनुभावों
की छाया अक्सर
एक निशान छोड़ जाती हैं..
बस शब्द ही नहीं
निकलते मुख से..
घिरे हुए बादलों के बीच
बरसात ही नहीं होती
जाने क्यों?
शब्द ही नहीं निकलते मुख से।

दस्तक

तुम्हें आकाश में
तारों की चाहत थी
मुझे हमेशा
मिट्टी की सौंधी महक,
तुम्हारे विचारों में
मैं डूब न सका
जिसमें तुम
हिलोरें लिया
करते थे,
तुम्हें अपनी
मुक्ति प्यारी थी
मुझे एक ज्योति
तलाशनी थी,
मेरे अंतर्मन में
शोर था
इसलिए मैं
तुम्हारी दस्तक
सुन न सका।

नीम

वो नीम के पेड़ की छांव
मुझे याद है
कभी तुम यूं ही
आ जाया करते थे,
हम कितनी देर
मौन बैठे रहते थे
शायद हरी पत्तियों
की आवाज हमारे बीच उपस्थित थी, या फिर कभी
पतझड़ की पीली पत्तियों की बरसात,
जो मुझे बहुत अधिक
भिगो देती थी,
आज यह नीम है
मैं हूं, वही कैंपस है
लेकिन
वो पत्तियां नहीं,
वो बरसात नहीं
जिसमें मैं भीग पाऊं
वो नीम का पेड़।

समय

कुछ संस्कार
कुछ मूल्य
कुछ आदर्श,
कुछ श्रद्घा
और सब कुछ प्रेम,
समय ने ही तो
सिखाया  था
लेकिन आज
वह कुछ और सब कुछ
तुम भूल
पाए हो?
आधुनिकता की चाहत में
संस्कारों को
मिटा डालने की कसक
शायद उन मूल्यों
पर परदा है..
जीवन की यह मांग
मूल्यों का पतन है
या फिर उत्थान?

 

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