मीना बाजार

जूतियां मारवाड़ की

चेतन चौहान

लोकप्रियता में एमरोडी जूती का प्रचलन ज्यादा है, क्योंकि इस पर की गई कशीदाकारी सभी को आकर्षित करती हैं। जूती बनाने वाले कारीगर सारी नाप-जोख अंगुलियों पर ही करते हैं।

बारीक तथा उच्च किस्म की कशीदाकारी, मजबूत सिलाई तथा अच्छे चमड़े के कारण जोधपुर की जूतियों ने अपनी एक अलग ही जगह बनाई है। मजे की बात यह है कि केवल भारत तक ही यह प्रसिद्घि सीमित नहीं है, बल्कि ये जूतियां विदेशी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनी रहती हैं। हालांकि दुख इस बात का है कि फैशन व अच्छे माल के अभाव में यह व्यवसाय दम तोड़ता-सा नजर आता है। लेकिन बावजूद इसके जोधपुर की जूतियों को पसंद करने वाले अभी भी बचे हुए हैं जिनकी वजह से ये कलात्मक जूतियां बारीक सिलाई, हाथ की सफाई व अनेक डिजाइनों में हल्की व मुलायम जैसी विशेषताओं के कारण मारवाड़ जूती व्यवसाय बस अपने ही दमखम पर चलता आ रहा है।

 

यहां बनने वाली जूतियों में मुड्डा, स्लीपट, खाड़ा, मोजड़ी, नोकदार पंजाबी व जनानी तथा एमरोडी प्रमुख हैं। लोकप्रियता में एमरोडी जूती का प्रचलन ज्यादा है क्योंकि इस पर की गई कशीदाकारी सभी को आकर्षित करती है। मजे की बात यह है कि जूती बनाने वाले कारीगर सारी नाप-जोख अंगुलियों पर ही करते हैं। ये सात अंगुल से 18 अंगुल तक की बनाई जाती है। अंगुल शब्द स्थानीय व देशी शब्दावली है। वैसे यह धंधा काफी मुनाफे का है क्योंकि एक जूती निर्माता कम से कम एक जोड़ी में कीमत का आधा भाग मुनाफे के रूप में कमा लेता है। जोधपुर में बनने वाली ये जूतियां, उदय मंदिर, प्रताप नगर व सिंवाचीगेट में बनाई जाती हैं, जहां अनेक परिवार वर्षों से बसे अपने पुश्तैनी काम को कर रहे हैं। इन जूतियों के निर्माण में सफेद व रंगीन धागा, विभिन्न रंगों के मखमल तथा रंग वगैरह सामग्री काम में लाई जाती है। सबसे पहले ये कारीगर जूती का ऊपरी भाग तैयार करते हैं, जिसे देशी भाषा में पंजा कहते हैं। पंजा जिसे पाना भी कहा जाता है, उसे स्त्रियां सलमा-सितारा, मोती के साथ बारीक व मनमोहक कशीदाकारी से आकर्षक रूप प्रदान करती हैं।

पंजे के आकार के आधार पर ही पुरुष कारीगर जूती का निर्माण करता है। जूती की तलियां बनने पर कारीगर द्वारा इसे जोड़ दिया जाता है। बस दोनों पांवों की जूती तैयार है। यह जरूरी नहीं है कि इन कारीगरों की जूतियां रोज बिके। लेकिन, ये लोग रोज माल तैयार करते हैं। यूं भी एक जोड़ी जोधपुरी जूती बनाने में डेढ़ दिन खप जाता है।
जूती बनाने का धंधा यूं तो समूचे मारवाड़ में फैला हुआ है। लेकिन इस व्यवसाय से जुड़े सर्वाधिक परिवार जोधपुर में ही हैं। वैसे भीनमाल की जूतियों का भी कोई जवाब नहीं है। मारवाड़ के अलावा जयपुर से 50 किमी. दूर रामजी कलां के भी अधिकांश परिवार इसी व्यवसाय से जुड़े हुए हैं, जो कि ग्राहक की पसंद के अनुरूप जूतियां तैयार करते हैं। जयपुर के आसपास बनने वाली चौफुला सिलाई की जूतियां भी सैलानियों को आकर्षित करती हैं, जिसमें 150 धागे डाले जाते हैं। इन जूतियों पर पॉलिश की जरूरत नहीं होती। ये कपड़े से झाड़ने पर ही चमक जाती हैं।
खैर, जूतियां बनाने का धंधा अब परिवार के उन्हीं पुराने लोगों के हाथ में है, जो अब कोई दूसरा हुनर जानते ही नहीं है। मारवाड़ व आसपास बनने वाली जूतियों की मांग पड़ोसी राज्य में है, जिनमें पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश प्रमुख हैं। कुल माल का 30 प्रतिशत राज्य के बाहर चला जाता है।

यदि आप जोधपुर आएं और यहां खरीदारी करने का मूड बनाएं तो एक बार यहां की मारवाड़ जूतियों को जरूर देखिएगा। हस्तकला के इस बेजोड़ नमूने को आपकी हौसलाअफजाई की जरूरत है।

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