मेरा कमरानहीं जानती किस गली में खत्म होगा कमरे का सफर। रचनाकार के लिए अपने व्यक्तिगत कमरे का होना एक प्रीतिकर सुख है। लेकिन ऐसा कम ही संभव हो पाता है। प्रवास में कमरे प्राय: बदलते रहते हैं। उनमें रहकर लेखन, इकट्ठी की गई चीजें, परिचितों और मित्रों के साथ तमाम बातें ताउम्र याद आती रहती हैं। यहां कमरे को लेकर कवयित्री अनामिका से सुने गए संस्मरण को प्रस्तुत कर रहे हैं मजीद अहमद।
ये मेरा क्या होता है? कौन मेरा है? कौन मेरा नहीं है? कानून की भाषा बोलूं तो शायद वह स्पेस मेरा है जहां से कोई मुझे चुटिया पकड़ कर बाहर निकाल न सके। है कोई ऐसी जगह? है तो जल्दी सामने आए। मैं उसकी सवारी करूं और उड़ जाऊं। कहां है मेरा पुष्पक विमान! चलो छोड़ो, पुष्पक की सवारी करने वाली की दशा और भी विकट थी। बहिष्कृत होने पर उसका कमरा स्वाभिमान बना। मेरा कमरा शायद मेरा हवन्नकपन होगा। उसका ताला कभी बंद नहीं होता। लैच ही टूटा है- हवन्नकपपंथी की लैच-सिटकिनी टूटी है। हवा आती-जाती रहती है- पड़ोस के बच्चों की तरह। कभी-कभी कोई खिलौना भी छोड़ जाती है। एक बार एक नन्ही-सी चप्पल यहां छूटी थी। मैंने उसे किसी कील के सहारे अब तक दीवार पर टांग रखी है। वह मेरी दीवार घड़ी है! बंद दीवार घड़ी! वक्त वहां दुबका पड़ा है- जैसे वहां घोंसले में तीन दिन का वह नन्हा शावक! चोंच खुली है उसकी। जिसने चोंच दी है, दाना वही डालेगा। इस कमरे में मेरे साथ एक भूत भी रहता है। मेरी किताबों के साथ, लुका-छिपी खेलता भूत! जो चीजें मैं अतिरिक्त सावधानी से बहुत संभालकर रखती हूं, उनका खो जाना तो मौत की तरह निश्चित है! चीजें और संबंध ज्यादा संभाल बर्दाश्त नहीं करते। कमरे की दीवारों पर ढेर से चकत्ते हैं। जन्मों के बिछड़े हुए चेहरे! लम्बूतरे और चौड़े, गोल तिकोने चेहरे! पानी के चेहरे! पानी के दाग का अवशेष! पानी ने दीवार को दागा है। पानी भी दागता है। पानी कुछ भी कर सकता है! क्या पानी वक्त का चाबुक है? बहता पानी निर्मला? और वक्त? वही जो रुका और स्मृतियों में उतर गया। बरसात में मेरी छत टपकती है, मेरे वजूद की छत! मजेदार लय में टपकती है। टपकने के पहले एक बूंद नवप्रसूता का स्तन हो जाती है। स्वयं को पूरा उड़ेल पाना इतना आसान भी नहीं होता! वो देखो- वहां उस कोने में- वो टूटा हुआ छाता- जो अब कहीं भी नहीं आता-जाता। उसकी चटख कालिमा धूल के चकत्तों से कितनी धुंधली पड़ गई है। मैंने उसे लैंप शेड बना रखा है। अब वह भी कमरा है। एक छत- प्रकाश के लिए! धीमे प्रकाश के लिए! क्या वह प्रेम का प्रकाश है? स्निग्ध और मीवा? किसी को जरा-सा भी आहत करने की, किसी की निगाह में खटकने की इसकी मंशा नहीं है! एक एहसास-भर, है और है! अपने नहीं होने में भी होने की खूबसूरत जिद से भरा! और वो देखो- चटाई! धूप की चटाई! रात में वही चांदनी की चटाई हो जाती है। वहां मेरी थकान बिल्ली की तरह दबे पांव आकर चुपचाप ऊंघ जाती है। देह-मन समेटकर एक तरफ लेट जाना मुझको अच्छा लगता है। रूठ जाना मुझको अच्छा लगता है। बचपन में पापा सुलाते थे- पांवों के पास मां लेट जाती थी और बायीं तरफ भैया। पापा कविताएं गाते और कहानियां अभिनीत करते हुए- हंसते-हंसाते हुए। एक और, एक और भी वो जिद थमती नहीं! अंत में पापा कहते- अब कल, मेरी मुसबिलवां, कल! और मैं रूठ जाती! रूठने से मन का लगान कुछ कम होता और नींद आ जाने में सुविधा हो जाती। संलग्न मन कब सो पाता है? संलग्न मन को कहां चैन? भैया हंसता कहता- अच्छा मां, चलो, अब हम भी सो जाएं। दो कवियों की लड़ाई हो गई। अब मैं किसी से भी रूठती नहीं! रूठने के लिए वह आश्वासन जरूरी है कि अभी कोई आकर मना लेगा। मेरे बच्चे मुझे मनाते हैं, कभी-कभी पतिदेव भी। उन सबका सेंस ऑफ ह्यूमर भी अच्छा है, पर रूठने-मनाने की इस खिलंदडी प्रक्रिया के साथ पिता का चेहरा इस तरह सन्नद्घ है कि और किसी को मेरा अवचेतन बहुत देर मनाने का गौरव देना ही नहीं चाहता। उम्र के साथ ममता का आधिक्य भी हो ही जाता है। अब किसी को सताना अच्छा भी नहीं जान पड़ता, सो कई बार खुद से ही खुद को मनाकर काम पर चल पड़ती हूं- आयोडेक्स मलिए, काम पर चलिए! हमारे समय का आप्तवाक्य शायद यही है! दुनिया अगर हॉस्टल है तो इस हॉस्टल में मुझे अब तक कोई सिंगल-सीटर नहीं मिला। एक समय मैंने किसी-न-किसी से अपना स्पेस साझा जरूर किया है। साझा करना मुझको अच्छा भी लगता है! जिसका आवेदन ही नहीं किया, वह मिले भी कैसे? सूर्योदय के पहले का वक्त मेरा कमरा है! बहुत पहले एक गजल लिखी थी- कोई सोए साथ भले पर जगते सभी अकेले हैं, सबकी अपनी ही थकान है, सबके अलग झमेले हैं। सूर्योदय के पहले का वक्त मुझको स्पेस दे देता है- सोचने का, पढ़ने-लिखने का। उससे ज्यादा वक्त चुराना हो तो पुस्तकालय कक्ष है ही। डीटीसी भी मुझे एक कमरा ही लगती है। भीड़ मुझे एक सुनहरा एकांत दे देती है। आंखें खुली होती हैं। कान खरहे के कान हो जाते हैं। पर मन गहरी तलैया में डुबकी लगाने को स्वतंत्र हो जाता है- सारी इंद्रियों से निरपेक्ष मेरे एकांत की तलैया का तट अक्सर भीड़-भड़क्का ही होता है। फिर प्रकृति रानी भी हैं ही, उनसे गेस्ट हाउस में तो सबकी बुकिंग है। पेड़ों की छांह से अधिक शानदार किस कमरे की कल्पना आप कर सकते हैं। इन दिनों तो आधी रात बच्चों के कमरे में सोती हूं। उनसे उनकी स्मृतियां, चिंताएं, सपने, योजनाएं साझा करती हुई, उनक चम्पी-मालिश करती, कुछ-कुछ समझाती, कुछ समझती हुई। बाकी आधी रात इनके कमरे में सो जाती हूं। इनकी सांस कुछ फूलती है, पांव दुखते हैं। छब्बीस वर्षों का साथ वह भी परदेस में, जहां हम रोजी-रोटी की तलाश में आए हींग से हल्दी तक, खाट से खटोले तक, सब कुछ खरीदा। खूब लड़ी मर्दानी भाव से लड़ी भी मैं जिनसे और जिनकी झिड़कियां भी वीर-भाव से खाईं- ऐसे मेरे ये डॉक्टर, बीमार भी रहे हैं- ये मैं कैसे भूलूं! घर यदि रणभूमि है, तो रणभूमि को पीठ क्या दिखाना! कम से कम ओपेन हाउस तो है ये- सबका कमरा- यहां कोई भी आ सकता है, ठहर सकता है। यह पूरा घर ही एक कमरा है- हर आने-जाने वाले का कमरा! खुली खिड़कियों वाला कमरा! साझा कमरा! पिताजी की एक कविता है- एक मुसाफिरखाने में दस दिन से ज्यादा कौन रुके, जाने वाले जा जल्दी कि आने वाला आएगा, फिर से लौट न पाएगा। रतना की निंदिया खुलती जब तुलसीदास चले जाते, रह जाएंगे पथ-दर्शक, भरमाने वाला जाएगा, फिर से लौट न पाएगा। - (श्यामनन्दन किशोर) तो कमरा जाने के लिए ही है! कमरा वही है जहां से सफर शुरू होता है.. खतम कहां, किस गली में होगा, कोई नहीं जानता। |




















