कचहरी

अधिकार आपका


प्रीति रिंकू

कानून वही जो आपको आपके हक से रूबरू कराए। लेकिन ज्यादातर कानून के बारे में आपको जानकारी ही नहीं होती। फिर यह कैसे पता चलेगा कि किस कानून में महिलाओं को कितना हक है। ऐसा ही एक कानून है वनाधिकार कानून। क्या जानती हैं आप?

संविधान के अनुच्छेद 14 में महिला और पुरुष के बराबरी के अधिकार को एक बुनियादी अधिकार के रूप में स्थापित किया गया है तथा लिंग के आधार पर किसी भी भेदभाव को गैर संवैधानिक माना गया है। लेकिन, जब महिलाओं को जल, जंगल और जमीन का अधिकार देने की बात आती है, तो देखने में आता है कि ऐसे ज्यादातर कानूनों में महिलाओं की उपेक्षा ही की गई है। कुछ वर्ष पहले पारित हुए वनाधिकार कानून को छोड़कर किसी भी कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। महिलाओं के भूमि संबंधी अधिकारों को हमेशा उनकी संपत्ति के सवाल के साथ जोड़कर देखा जाता है। उन्हें सिर्फ पारिवारिक विरासत को लेकर बने कानूनों के आधार पर सीमित अधिकार दिए जाने की बात की जाती है। लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसे मामलों में भी ज्यादातर उन्हें स्वतंत्र रूप से अधिकार नहीं दिया जाता।

वर्ष 2006 में वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को मान्यता देने के लिए एक कानून पारित किया गया, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत निवासी (वनाधिकारों को मान्यता) कानून। यह कानून केवल वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को ही मान्यता देने का नहीं, बल्कि देश के जंगलों एवं पर्यावरण को बचाने के लिए वनाश्रित समुदाय के योगदान को भी मान्यता देने का कानून है। इसमें वनभूमि एवं वनों पर महिलाओं के समान अधिकार को मान्यता देने की बात कही गई है।

वनाधिकार कानून में पहली बार वनों पर महिलाओं के मालिकाना हक की बात कही गई है और व्यक्तिगत एवं सामुदायिक अधिकारों पर भी महिलाओं के मालिकाना हक को दर्ज करने के कानूनी प्रावधान किए गए हैं, लेकिन वन एवं वन भूमि पर गरीब आदिवासियों का नियंत्रण स्थापित हो जाने के डर के चलते वन विभाग, प्रशासन, राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार ने इन समुदायों को मालिकाना हक देने के लिए अभी तक कोई इच्छा नहीं दिखाई है।

समाजशास्त्री डॉ़  हेतकर झा का कहना है कि सरकार इन्हें इसलिए नहीं चाहती, क्योंकि वनाधिकार कानून की मंशा के अनुसार जब जंगल महिलाओं और वंचित समुदायों के मालिकाना हक में आ जाएंगे, तो वह ब़डी-ब़डी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को बड़े पैमाने पर न तो कौड़ियों के दाम वन भूमि उपलब्ध करा पाएगी, न प्राकृतिक संसाधनों का कोई सौदा होगा और न वन विभाग, पुलिस, प्रशासनिक अधिकारियों एवं माफियाओं-दलालों आदि को जंगल से किसी तरह की अवैध कमाई हो सकेगी। खासतौर पर वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी बड़े पैमाने पर होने वाली इस अवैध कमाई से सूदखोरी का काम नहीं कर पाएंगे।

आजादी से लेकर अब तक वन विभाग ने महिलाओं एवं समुदाय विशेष का वनों से अलगाव पैदा करने के लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी। इसलिए ऐसा कोई भी कानून, जो वनों एवं प्राकृतिक संसाधनों पर महिलाओं और समुदाय विशेष के नियंत्रण की बात करता हो, उसे वन विभाग किसी भी कीमत पर लागू नहीं होने देना चाहता। मालूम हो कि वनाधिकार कानून वनों में रहने वाले आदिवासी समुदायों द्वारा पिछले 250 वर्ष से तिलका माझी, सिदहू-कान्हू एवं बिरसा मुंडा आदि के नेतृत्व में लगातार किए जा रहे संघर्ष का ही नतीजा है। अंतत: संसद को वनाश्रित समुदाय के लिए यह कानून पारित करना पड़ा। यह संघर्ष अब वन क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं की अगुवाई में और भी तीखा हो गया है।

वनों के इतिहास में और आजादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि महिलाओं के व्यक्तिगत भूमि के अधिकार सहित सामुदायिक और प्रबंधन के अधिकार को भी मान्यता दी गई है। इस मुद्दे पर देश के कई महिला संगठनों ने इस संदर्भ में बनी संयुक्त संसदीय समिति को भी प्रस्ताव दिए थे। हालांकि पूरी तरह से अभी भी इन अधिकारों को महिलाओं को केंद्र में रखकर दर्ज नहीं किया गया है, जो नितांत जरूरी था। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अगर देखें तो महिलाएं पुरुषों की तुलना में प्रकृति के कहीं ज्यादा नजदीक होती हैं और उनमें सामुदायिकता का भाव भी अधिक होता है। यही कारण है कि वनाधिकार कानून में महिलाओं के जिन अधिकारों को मान्यता दी गई है, उनका अपना एक महत्व है। अब वनों से संबंधित किसी भी मामले पर केवल पुरुषों का ही एकाधिकार नहीं होगा, बल्कि ये अधिकार किसी पुरुष को तभी मिलेंगे, जब उसके साथ परिवार की महिला का अधिकार भी दर्ज होगा। अगर कहीं पर एकल महिला है या परिवार की मुखिया महिला है, तो भी यह अधिकार उसी के नाम से दर्ज होगा।

इससे पहले इस तरह का अधिकार आज तक हमारे देश की महिलाओं को वन भूमि पर कभी नहीं मिला और न जंगल पर। अधिकारों की बात तो दूर, महिलाओं द्वारा कृषि कार्यो में 90 प्रतिशत से अधिक योगदान करने के बावजूद आज तक उन्हें किसान होने की मान्यता तक नहीं दी गई। देश में आज तक जितने भी भूमि संबंधी कानून बने हैं। उनके अनुसार, घर के पुरुष मुखिया का देहांत हो जाने पर बेटे अथवा परिवार के अन्य पुरुषों को वंशज होने के नाते संपत्ति का अधिकार मिल जाता है।

वनाधिकार कानून से पहले बने अन्य भूमि संबंधी कानूनों के आधार पर महिलाएं भूमि पर बराबर और सीधा मालिकाना हक प्राप्त नहीं कर सकती थीं। इसलिए वनों से जुड़ी महिलाओं के लिए वनाधिकार कानून बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें भले ही अधिकार आंशिक रूप से मिले हों। लेकिन जितने भी हैं, उनके सहारे वे अपने बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था और किसी हद तक आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक सुरक्षा भी हासिल कर सकती है।

वनाधिकार कानून के अध्याय 3 में 13 अधिकारों का उल्लेख है, जिनमें तीन अधिकार व्यक्तिगत हैं और शेष सामुदायिक मामलों से जुड़े हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण अधिकार लघु वनोपज से संबंधित है, जो वनाश्रित समुदाय के लिए आजीविका का प्रमुख स्रोत है।

महिलाओं के भूमि एवं वन संबंधी अधिकारों को पहली बार स्वीकार करने वाले वनाधिकार कानून ने वनाश्रित समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय के मद्देनजर उनके कई अधिकारों को मान्यता दी है। इन अधिकारों में महिलाओं की बराबर हिस्सेदारी सुनिश्चित की गई है। महिलाओं को अपने हक के लिए जागरूक होना होगा, वनाधिकार कानून को समझना होगा और आम नागरिक समाज को भी उनके समर्थन में आगे आना होगा।

(अनिता पांडेय, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट, से बातचीत पर आधारित)

 

सवाल-जवाब

रंजना भारद्वाज - कानूनी विशेषज्ञ

मेरे पड़ोस में एक महिला अपने सौतेले पुत्र को बहुत पीटती है। क्या उस पर कोई कार्यवाही हो सकती है।

गीता बाजपेई, बनारस

यदि कोई व्यक्ति जो नाबालिग बच्चों पर नियंत्रण रखने के लिए उन पर किसी भी तरीके का शारीरिक या मानसिक कष्ट पहुंचाता है, तो उसे किशोर न्याय अधिनियम 2000 की धारा 23 के अंतर्गत 6 माह तक का कारावास अथवा जुर्माना अथवा दोनों से दंडित किया जा सकता है।

 

यदि कोई व्यक्ति अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए बिना किसी दूसरी स्त्री से विवाह कर लेता है जिसमें उसके माता-पिता भी शामिल होते हैं तो इसमें क्या सजा हो सकती है।

गुंजन शर्मा, यूपी

पहली पत्नी के होते हुए भी दूसरा विवाह करने वाले व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता की धारा 494 एवं 497 के अंतर्गत सजा हो सकती है। उसके माता-पिता को भारतीय दंड संहिता की धारा 109 के अंतर्गत दुष्प्रेरण के लिए दंडित किया जा सकता है। यदि दुष्प्रेरण साबित हो जाए।

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