जब वी मेट

पहले पड़ोसी अब जीवनसाथी


रेनू सैनी

कौओं के मित्र और लेखक नवीन खन्ना और उनकी हमसफर के मिलने और विवाह बंधन में बंधने की कहानी साधारण होते हुए भी असाधारण है। नवीन और सुनीला के पहले परिचय और आजीवन साथ की कहानी, उनके अपने ही शब्दों में।  

नवीन खन्ना- मेरा परिवार बेहद संस्कारी था। माता-पिता ने सभी भाई-बहनों की परवरिश बेहद लाड़-प्यार से की। उनकी बदौलत मैं उच्च शिक्षा ग्रहण कर एक अच्छी नौकरी में लग गया था। मेरे लिए वधू की तलाश जोरों पर थी। सुनीला का परिवार हमारे पड़ोस में ही रहता था। मेरी बहनें अक्सर वहां जाती थीं। मैं भी जाता था। पर अचरज की बात यह थी कि मैंने उसे नहीं देखा था। मेरी बहनों को सुनीला बहुत पसंद थी। मुझे भी वह एक नजर में भा गई।

सुनीला- मैं लेडी इर्विन कॉलेज से पढ़ी थी और रोजगार तलाश कर रही थी कि तभी माता-पिता ने ऐलान कर दिया कि मेरे लिए वर तलाश किया जा रहा है। स्वयं मुझे भी यह नहीं पता था कि मैं जिनके साथ सात जन्मों के पावन बंधन में बंधूंगी वह हमारे पड़ोसी ही होंगे। जब मैंने इनको देखा तो सच कहूं तो ये मुझे उतने पसंद नहीं थे। प्रत्येक लड़की अपने स्वप्न में एक राजकुमार संजोए रहती है। इनकी तस्वीर कुछ अलग थी।

नवीन खन्ना- सुनीला मेरे स्वप्नों की राजकुमारी से भी ज्यादा खूबसूरत, समझदार और संस्कारी थी। मैं चाहता था कि मेरी पत्नी शिक्षित होने के साथ-साथ वर्किंग भी हो। रिश्ता पक्का होने के बाद मैंने सुनीला से बहुत बार मिलने की कोशिश की, किंतु मैं जहां इनसे मिलने के लिए खड़ा होता तो यह रास्ता ही बदल लेती थीं।

सुनीला- उस समय जमाना इतना स्वच्छंद नहीं था। न ही लड़के-लड़की का पहले मिलना अच्छा समझा जाता था। फिर मैं थोड़ी संकोची प्रवृत्ति की भी थी। इसलिए रास्ता बदल लेती थी।

नवीन खन्ना- हमारी सगाई 15 अगस्त 1974 को हुई थी और शादी 18 जनवरी 1975 को। इस प्रकार हमारा विवाह अरेंज्ड था। धीरे-धीरे हमारे बीच प्रेम पनपा और उसकी जड़ें इतनी अधिक गहरी हो गईं कि हमें ये लगने लगा कि जब-जब भी हम धरती पर जन्म लेंगे तब-तब हम हमेशा एक-दूसरे के करीब रहेंगे। विवाह होने के बाद मैंने और सुनीला ने एक-दूसरे के शौक, शिक्षा, परिवार आदि पर विस्तृत चर्चा की। हमने आरंभ में ही यह फैसला कर लिया था कि चाहे हमारे बीच कितनी ही तकरार हो किंतु उस तकरार को खाई नहीं बनने देंगे और अगले दिन की शुरुआत झगड़ा खत्म करके प्रेम से करेंगे।

सुनीला- जब कभी ऐसा पड़ाव आ जाता कि लड़ाई बहुत भयंकर होने वाली होती और किसी एक का भी मन लड़ाई खत्म करने को न करता तो हम अपनी आवाज में की हुई इस रिकार्डिंग को चला देते कि दोनों रूठे रहेंगे तो मनाएगा कौन। हंस दो, चलो प्यारे, खत्म करो अब ये मौन। इस प्रकार हमारे सुखद दांपत्य की गाड़ी खट्टी-मीठी तकरार के साथ आगे बढ़ती रही और साथ ही प्रगाढ़ होता रहा हमारा प्रेम। अब हमारी स्थिति दीया और बाती वाली हो गई है। 

नवीन खन्ना- आज लड़के-लड़की विवाह के तुरंत बाद एक-दूसरे को समझने के बजाय उनकी कमियां तलाश कर उस पर बहस करने लगते हैं। इसका अंत उनके अलगाव पर या असमय मृत्यु पर होता है। पर भारतीय पत्नी के संस्कार कुछ और हैं। डॉक्टरों ने मुझे गले का कैंसर बताया। यह सुनकर सभी सकते में आ गए। इस बीमारी को जड़ से हटाने के लिए मेरी पत्नी ने इतनी अधिक दौड़भाग की कि मेरे मुंह से स्वत: ही यह निकल गया कि ऐसा सिर्फ और सिर्फ एक भारतीय पत्नी ही कर सकती है।

सुनीला- मैंने हमेशा इनके शौक को बढ़ावा दिया। हालांकि शुरू-शुरू में जब इन्होंने बताया कि कौए इनके दोस्त हैं तो मुझे बहुत हंसी आई थी किंतु अब जब इनका और कौओं का एक-दूसरे के प्रति जबरदस्त आकर्षण व लगाव देखती हूं तो मुझे गर्व भी होता है कि इन्होंने एक ऐसे अलग काम में अपनी पहचान बनाई है जो बेमिसाल है। कौओं से दोस्ती के कारण इनका नाम तीन बार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में आ चुका है, एनसीईआरटी ने इनकी कौओं से दोस्ती पर फिल्म भी बनाई है।

नवीन खन्ना- आज मेरी जो पहचान और नाम है उसमें मेरी पत्नी सुनीला का बहुत बड़ा हाथ है। विवाह अरेंज्ड हो या लव, किंतु समझदारी और सूझबूझ दोनों में जरूरी है और यह तभी संभव है जब दोनों ही समझदारी दिखाएं और एक-दूसरे की कमियों व खूबियों को अपनाते हुए जीवन को महकाएं।

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