हैरतअंगेज

अलबेले सिक्के, अनूठी दुनिया


वर्षो पूर्व बर्मा में चाय, रूस में रोटी, चीन में मट्ठा तथा वैनी कोरोद्वीप में पक्षियों
के पंखों का सिक्के के रूप में चलन था। सिक्कों के प्रचलन का इतिहास बड़ा ही दिलचस्प है। इन्हीं विचित्र सिक्कों की एक कहानी आपको बता रहे हैं दिनेश दर्पण।
 

पुराने समय से ही सिक्के हमारी सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक स्थितियों के मूक साक्षी रहे हैं। दुनिया में अलग- अलग प्रकार के अनेक रूप-रंग और आकार के सिक्कों का प्रचलन रहा है। यदि हम विभिन्न प्रकार के सिक्कों पर नजर डालें तो हमें यह जानकर हैरानी हो सकती है कि इनका संसार भी कम विचित्रताओं से भरा हुआ नहीं है। कोई सिक्का हैट की आकृति का  तो कोई फावड़े के आकार का, कोई सिक्का घोड़े की नाल जैसा तो कोई चीते की जीभ के समान। इसके अलावा कागज, धातु, चमड़े, पत्थर, कौड़ियां आदि कई प्रकार के सिक्के संसार के विभिन्न भागों में प्रचलित रहे हैं।

संसार में सबसे बड़ा सिक्का हावर्ड गिब्ज नामक व्यक्ति के पास रखे तांबे के सिक्के को माना जाता है। इसका वजन लगभग 43 किलोग्राम है। लगभग 150 वर्ष पूर्व अमेरिका के उत्तरी देशों में इस सिक्के का प्रचलन था।

वर्षो पूर्व बर्मा में चाय, रूस में रोटी, चीन में मट्ठा तथा दक्षिणी समुद्र के पास स्थित वैनी कोरोद्वीप में पक्षियों के पंखों का सिक्के के रूप में चलन था। पंखों का मूल्य पंखों की सुंदरता पर आधारित होता था। दक्षिणी समुद्र में याब नामक द्वीप में पत्थर के टुकड़ों का सिक्के के रूप में चलन था। फिजी द्वीप में ह्वेल मछली के दांत और दक्षिणी अफ्रीका में हाथी के बाल भी सिक्कों के रूप में प्रचलित थे। बालों की लंबाई के अनुसार उनका मूल्य निर्धारित होता था।

क्या पैसों का पेड़ लगा है? यह वाक्य हम अकसर अपने बड़े-बुजुर्गो से सुनते चले आ रहे हैं। पर वास्तव में एक स्थान ऐसा भी रहा जहां सिक्कों के पेड़ लगाए जाते थे। मलाया प्रायद्वीप में मल्लका नामक स्थान पर लोग सिक्कों का पेड़ बनाते थे। इस वृक्ष में सेब की तरह असंख्य दर्जन सिक्के लटकाए जाते थे। सिक्कों के पेड़ का मालिक अपनी आवश्यकतानुसार पेड़ से सिक्के तोड़कर उपयोग में लिया करता था। सिक्के समाप्त हो जाने पर पेड़ को उखाड़कर फेंक दिया जाता था।

कुर्दिस्तान में बहुत पहले गोंद की बूंदों को भी सिक्कों के रूप में व्यवहार में लाया जाता रहा। बाद में वहां चांदी के बहुत पतले तारों के सिक्कों का प्रचलन शुरू हुआ। वहां मिश्री के टुकड़ों को भी सिक्कों के रूप में उपयोग में लाया जाता था।

वर्तमान में कागज के नोटों का चलन सिक्कों के रूप में प्रचलित है, किंतु मचूरिया के लोग कागज के सिक्कों का व्यवहार काफी समय पहले से ही करते चले आ रहे हैं। वहां के कागज के सिक्के बहुत छोटे तथा आकर्षक हुआ करते थे। इनका आकार हमारी बसों के टिकट के बराबर हुआ करता था। वहां के लोगों को जितने कागज के सिक्कों की आवश्यकता होती थी, वे उतने ही सिक्के प्रेस में छपवा लिया करते थे।

हमारे देश में भी विभिन्न प्रकार के सिक्कों का प्रचलन रहा है। यहां पत्थर, मिट्टी, कौड़ियां, चमड़े, स्वर्ण, रजत, तांबा, स्टील आदि के सिक्कों का उपयोग किया जाता रहा है। प्रचलित सिक्कों पर मुख्यत: यहां के राजाओं, महापुरुषों, प्रसिद्घ व्यक्तियों, आर्थिक सामाजिक विकास की कहानियों तथा महत्वपूर्ण घटनाओं, महान नेताओं को चित्रित किया गया है। समय-समय पर विशेष अवसरों के लिए विशेष सिक्कों को भी जारी किया जाता  रहा है।

ऐसे मिला कांटा-चम्मच

कांटा-चम्मच का आविष्कार कुछ अनोखी परिस्थितियों में हुआ था। फ्रांस के राजा हेनरी द्वितीय (1551-1589) को साफ चमकदार कपड़े धारण करने का बेहद शौक था, किंतु भोजन करते समय अक्सर गोश्त उनकी उंगलियों से फिसल कर कपड़ों पर गिर जाता तथा उन्हें बीच में ही खाना छोड़कर कपड़े बदलने पड़ते थे। दिन-रात वह इसी समस्या के निदान के लिए उपाय सोचते रहे। अंतत: उन्हें एक उपाय सूझ ही गया। उन्होंने खाना खाने के लिए दो टांगों वाले एक कांटे का निर्माण कराया। इससे उन्हें भोजन करने में ब़डी सहूलियत हो गई। इस कांटे के प्रयोग से उनके कपड़ों पर दाग-धब्बे लगने बंद हो गए। बाद में उन्होंने इन दो टांगों वाले कांटे को पेरिस के प्रसिद्घ रेस्तरां के मालिक के पास भेजा। यहीं से पहली बार मिला संसार को कांटा-चम्मच। आज तो यह संस्कारित भोजन का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है।

डा. हनुमान प्रसाद उत्तम

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