संपादकीयपुरानी यादों के साथ 2012साल 2012 हमारे सामने खड़ा है और हम हैं कि अभी भी मुड़ मुड़कर 2011 में झांकने को मजबूर हैं। क्या करें, इंसानी फितरत है। जो बीत गया सो बात गई वाली कविता सुनने और सुनाने में तो अच्छी लगती है, मगर अपनाने में नहीं। पुरानी यादों को समेटे हुए ही तो हम जिंदा रहने के लिए कदम आगे बढ़ाते हैं। जैसे..देवानंद का एकाएक जहां से गुजर जाना, फिर भी स्मृतियों में मिटता नहीं जवां देव साहब का अक्स। उनका टेढ़े हो-हो कर चलना और मुस्कराते हुए गीत गाना भूलेगा भी तो कैसे। जैसे दिल्ली के सौ बरस बीतने के बाद हम अलग-अलग तरीके और तर्कों के साथ झांकते रहे दिल्ली के उन दिनों में जब यह लुटियन की दिल्ली थी, हरी-भरी थी, यमुना का बहाव थमा नहीं था। आज आसमान छूती इमारतों के मास्टर प्लानिंग और मेट्रो रेल की स्पीड में भागती दिल्ली को किसी न किसी बहाने वही पुरानी दिल्ली ही पुरजवां होने और नए जोश के साथ आगे बढ़ने का साहस देती है। यूं तो फेसबुक के जमाने में हम रोज नए लोगों को अपने साथ जोड़ते हैं, मगर क्या पुराने भूल पाते हैं। मुड़-मुड़कर याद आती हैं बचपन की वो गलियां जहां छोटी-छोटी टॉफी और चॉकलेट के साथ जुड़ती थीं नई और पक्की दोस्ती की गांठें। याद आती हैं स्कूल की वो सारी छिपकर की गईं शरारतें जिन्होंने जिंदगी में डर और साहस को एक साथ चलने का मौका दिया। वो सारी बीती उपलब्धियां जो आज भी किसी नई उपलब्धि से पहले जिक्र का बायस बन ही जाती हैं। सारे बिछड़े हुए रिश्तों को यादों के आंगन में जाकर खोजना और उन्हें मन के भीतर ही बार-बार टोहना.. यूं ही तो हमें अच्छा नहीं लगता। कुछ वजह होती है। मतलब साफ है कि हम आगे बढ़ते हैं, मगर पुरानी पगडंडियों के साथ-साथ। इसलिए, कीजिए नये साल का स्वागत, पर मन यदि पीछे घूम जाता है और कुछ पलों के लिए ठहर जाता है उसी काल खंड में तो घबराइए नहीं। यकीनन, यह आपके और हमारे भीतर बैठे इंसान को इंसान बनाए रखता है। यही तो चाहिए हमें। जिंदा रहे इंसानियत हर हाल में। वैसे 2012 को लेकर जहां उमंगों ने नई अंगड़ाई ली है, वहीं भीतर संशय का वह अनचाहा-सा डर भी मचल रहा है यह जानने के लिए कि क्या सचमुच 2012 आखिरी कैलेंडर होगा इस दुनिया के लिए। कम से कम मेरा मन नहीं मानता। भरोसा करने का फिर सवाल कहां। प्रश्न जरूर उमड़ते-घुमड़ते हैं, लेकिन अंदर का साहसी इंसान बार-बार कहता है..चक्र कभी नहीं रुकता। जीवन भी नहीं रुकेगा। 2012 के बाद 2013 भी आएगा और 2013 के बाद 2014 भी। हम आगे का पूर्वानुमान यूं ही लगाते रहेंगे और पीछे के बरसों में गुजरे हुए कुछ यादगार लम्हों को भी संजोते रहेंगे क्योंकि जीना..इसी का नाम है। यह जानते हुए भी कि महंगाई पीछा नहीं छोड़ेगी, हमारी रसोई पर बार-बार वार करेगी, यह जानते हुए भी कि महिलाओं की सुरक्षा और स्वरक्षा के लिए भी हर बार की तरह कुछ औपचारिकताएं निभा दी जाएंगी, कुछ खास नहीं बदलेगा..हम फिर भी नाचेंगे, झूमेंगे, पार्टी करेंगे। नया साल का पहला महीना नए संकल्पों और नई योजनाओं को बनाते हुए बीतेगा। आप भी हमारे साथ शामिल होंगे पार्टी स्पेशल में। इस बार बुनाई स्पेशल के साथ कांबो पैक पार्टी सेलिब्रेशन का ताकि आप जानें कि पार्टी के नए थीम क्या हो सकते हैं, वैसे पूलसाइड पार्टी से लेकर हैलोवीन और यहां तक कि घर की छत पर मनाई गई पार्टी में प्रोफेशनल तड़का लगाया जा सकता है। तैयार रहिए..इस अंक में आपको मिलेगा वह सब जो किसी भी पार्टी को यादगार बनाने के लिए जरूरी है। इन दिनों बड़ी स्क्रीन पर छाई हैं विद्या बालन तो छोटे पर्दे पर भी जलवा है पोर्न स्टार सनी लियोन का। दोनों में एक ही खास बात है। दोनों डर्टी अदाओं के नए अर्थ गढ़ रही हैं। तो क्या पर्दे पर दिखतीं हुस्न की इन डर्टी अदाओं को प्रोफेशनल मानकर मनोरंजन कर लिया जाए या कभी झांककर देखा जाए इन जलवों के पीछे की स्याह सच्चाई। हमने सोचा, क्यों न झांका जाए और इसीलिए कथानक बना -हुस्न की डर्टी अदा जिसमें सनी लियोन की जिंदगी को तो आप करीब से जानेंगी ही, सहारा नाइट, यास्मीन, रिंपा की डर्टी अदाओं के बाजार के पीछे छिपे कुछ अजीबोगरीब तर्कों से भी रूबरू होंगी। इसके अलावा हम-तुम में बात उन महिलाओं की जो कामयाब हैं, पर रोमांस में फिसड्डी, मनोविज्ञान में भावनाओं के समंदर में बदलती लहरों का आकलन, वनाधिकार को लेकर कानूनी जानकारी कचहरी में और कामायन में सेक्स अपील का असल मतलब खोजने की कोशिश। दिलचस्प है साहित्यकार अनामिका का अपने कमरे को लेकर की गई टिप्पणी स्तंभ मेरा कमरा में। इंटीरियर में छोटे फ्लैट में मल्टीपरपज फर्नीचर के नुस्खे और सौंदर्य में विंटर केयर से लेकर हेयर स्टाइल की बातें। बात सुचित्रा सेन की भी जो कभी खूबसूरती की एक अनुपम मिसाल रहीं रुपहले पर्दे के लिए। इसके अलावा वह सब जो बिंदिया में आप चाहते हैं। कथा-गाथा, मनोरंजन, नटखट अंदाज और..बहुत कुछ। |





















