![]() |
|
|
|
संपादकीय
पुरानी यादों के साथ 2012
साल 2012 हमारे सामने खड़ा है और हम हैं कि अभी भी मुड़ मुड़कर 2011 में झांकने को मजबूर हैं। क्या करें, इंसानी फितरत है। जो बीत गया सो बात गई वाली कविता सुनने और सुनाने में तो अच्छी लगती है, मगर अपनाने में नहीं। पुरानी यादों को समेटे हुए ही तो हम जिंदा रहने के लिए कदम आगे बढ़ाते हैं। जैसे..देवानंद का एकाएक जहां से गुजर जाना, फिर भी स्मृतियों में मिटता नहीं जवां देव साहब का अक्स। उनका टेढ़े हो-हो कर चलना और मुस्कराते हुए गीत गाना भूलेगा भी तो कैसे। जैसे दिल्ली के सौ बरस बीतने के बाद हम अलग-अलग तरीके और तर्कों के साथ झांकते रहे दिल्ली के उन दिनों में जब यह लुटियन की दिल्ली थी, इंटीरियर
चलन
कथा गाथा
|























